Thursday 12 February 2009

बागी हुयी लड़की...

आज भी पुरानी डायरी के पन्ने ही हैं, बस इतना अन्तर है ये मेरे नहीं है...न मुझे मालूम है की ये किसकी लिखी कविता है...

तोड़कर रिश्ते पुरानी व्यस्त राहों से
चल रही बचकर जमाने की निगाहों से
जिंदगी है आजकल भागी हुयी लड़की...

छोड़कर अपनी पुरानी रूढियों के घर
आस्था, अनुशाषणों के बांधकर बिस्तर
फ़िर बढ़ा नाखून लंबे खोल कर निज केश
आ गई जो ख़ुद बगावत की नदी के देश
जिंदगी है आजकल बागी हुयी लड़की...

आज है जिस ठांव उसका नाम है जंगल
रह गए जिसके तिमिर में दस्युओं के दल
क्रूर भूखे भेड़ियों के चीखते स्वर से
चोर डाकू और लुटेरों के बढे डर से
जिंदगी है रात भर जागी हुयी लड़की...

एक दिन पूछा अचानक जबकि मैंने नाम
बहुत धीरे से बताया जिंदगी ने "शाम"
कर लिए हैं दांत तब से मौत ने पैने
और तब से नाम उस का रख दिया मैंने
वक्त की बन्दूक से दागी हुयी लड़की...

ये कविता बहुत बचपन में पढ़ी थी...और जाने इसमें कैसा आकर्षण है...कई बार पढ़ती थी...कुछ अपनी सी लगती थी ये लड़की, ये जिंदगी...ये बागी शब्द, शायद उस उम्र का असर हो। पर अब भी ये कविता अच्छी लगती है...सोचा आपसे भी बाँट लूँ, शायद आपमें से किन्ही को इसके लेखक का नाम पता हो.

Thursday 6 November 2008

पुरानी डायरी के पन्ने...

ख्वाब पुराने, तुम, और बीते लम्हों की बातें
कुछ भीगी सी और कुछ कुछ धुंधली सी रातें
कुछ उदास ही सुबहें, रूठी यादों के कतरे
कितना कुछ एक अधूरा रिश्ता दे गया...

जेहन में उतरती खुशबुयें आपस में घुलती थी
और तस्वीर बनाती थीं बीते हुए कल की
यूँ लगता था तुमने किसी और जनम में दी थीं
कितना कुछ जर्द पन्नों में दबा एक फूल सूखा दे गया...

कुछ दूर तुम्हारा हाथ थम कर चली थीं मैं कभी
तुम्हारे रूमाल में मेरे आंसू क्या आज भी रोते हैं
बादल अब बस तुम्हारी ही तस्वीर बनते हैं
कितना कुछ मेरी बाहों को आसमाँ तनहा दे गया...

खामोश खूबसूरत आंखों में खो जाने की ख्वाहिश
एक लम्हे में जिंदगी जी लेने का अहसास
जानते हुए भी की ख़त्म नहीं होगा, इंतज़ार तुम्हारा
कितना कुछ हमदम मेरे मुझे प्यार तेरा दे गया...

मुस्कुराहटें, सुनहले ख्वाब, जादे की बरं धुप
चाँद से की गई कितनी बातें और अनकहा कुछ
कुछ तस्वीरें और कुछ अधूरी सी कवितायेँ
कितना कुछ बीते कल का हर एक लम्हा दे गया...

१/७/०३

Friday 27 June 2008

एक नज़्म...

तू छिपा ले अपना दर्द मुस्कान के पीछे
पर मेरी आंखों में बादल बन बरसता तो है

तू चाहे तो कर मुझसे बेईन्तहा नफरत
यूँ ही सही तू मुझे सोचता तो है

मुझसे दूर जाने की खातिर ही घर बदला होगा तूने
पर गुजरता था जहाँ से तू वो रास्ता तो है

तू अपने आसमाँ को देखता है मैं अपने आसमाँ को देखती हूँ
पर जिस चाँद को तूने देखा वो कुछ मेरा भी तो है

अपने दोस्तों से तो तू लड़ नहीं सकता
मेरे बिना तेरा गुस्सा तनहा तो है

तुम्हारी जिंदगी की किताब में धुंधला सा ही सही
पर मेरी यादों का एक पन्ना तो है


२१/२/०१

Thursday 26 June 2008

कॉपी के पन्ने...२

तू दूर जाती है तो भूल जाता हूँ खुदा को भी
जाने किससे दुआ करता हूँ कि मुड़ कर देखो

आंसू नहीं तुम एक हसीं ख्वाब हो
कुछ देर मेरी पलकों पर ठहर कर देखो

किस कदर ज़ज्ब कर चुका हूँ तुझे मैं ख़ुद में
कभी मेरे करीब से गुज़र कर देखो

कहती हो मेरी आंखों में नशा सा है
मेरी आंखों में तुम हो जरा गौर कर देखो

मुझसे न पूछ मेरी जान मेरी वफ़ा का नाम
तन्हाई में अपने दिल से पूछ कर देखो

तुझसे भी खूबसूरत है तेरा नाम वफ़ा
न यकीं हो तो मेरी धड़कनें सुन कर देखो

Tuesday 24 June 2008

कॉपी के पन्ने

लड़कपन तो नहीं कह सकते लेकिन स्कूल के आखिरी सालों(12th) में हमेशा कॉपी के आखिरी पन्नो पर केमिस्ट्री के फार्मूला और फिजिक्स के थेओरेम के अलावा ये कुछ खुराफातें मिली रहती थी। माँ हमेशा इन्हें कचरा कहती थी, कोई कॉपी उलट के देखा तो क्या कहेगा। पर हम भी थेत्थर थे लिखते रहते थे, आज मेरे पास एक कूड़ेदान के जैसी दिखने वाली फाइल है, जिसमें सारे पन्ने फटे हुए रखे हैं। जब इनको खोलती हूँ तो लगता है एक दशक पीछे पहुँच गई हूँ...

इन कतरनों की कुछ पंक्तियाँ...

---०---०---

जिस्म के परदे हटा कर रूह तक झांक लेती हैं
मुहब्बत करने वालों की अजीब निगाहें होती है

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कोई जब मुस्कुरा के मुझको दुआ देता है
मुझको उसकी आँखें तुझ जैसी लगती हैं

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जब वो सोते हैं छुपा के अपनी नफरत पलकों में
तो लगते हैं कुछ कुछ मुहब्बत के खुदा जैसे

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मेरे जिस्म में यूँ बसी है उसकी खुशबु
वो मेरी रूह का हिस्सा जैसे
यूँ झुकती हैं पलकें उसको देख कर
वो ही हो मेरा खुदा जैसे

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यूँ लगता है तुम्हारे होठों पर मेरा नाम
काफिर के लबों से ज्यों दुआ निकले

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Saturday 21 June 2008

एक नज़्म भूली सी

सूखे हुए पत्तों को मसला नहीं करते
किसी से नफरत करते हैं पर बेवजह नहीं करते

जीने का अहसास दर्द से ही तो होता है
ज़माने के ज़ख्मों का यूँ गिला नहीं करते

दिलों में नफरतें हो तो फासले और भी बढ़ जाते हैं
यूँ भी बिछड़ के लोग अक्सर मिला नहीं करते

बेजान रिश्तों को दफन करना ही बेहतर है
भूली यादों के सहारे यूँ जिया नहीं करते

मेरे नफरतों के खुदा ये लब तेरी मुस्कराहट मांगते हैं
ये तो जानते हो दुश्मन ऐसी दुआ नहीं करते

Friday 20 June 2008

एक पुरानी याद

तुम्हें भूलने की ख्वाहिश शायद अधूरी सी है
फ़िर भी तुम बिन जीने की कोशिश जरूरी सी है

इतने गम मिले मुझको की आदत सी पड़ गई है
फ़िर भी तुम्हारे गम में वो कशिश आज भी थोड़ी सी है

न गुलमोहर है न जाड़ों की धूप और न तुम हो साथ
फ़िर भी उन राहों पर जाने को एक चाह मचलती सी है

मालूम है मुझको कि तुम अब कभी नहीं आओगे
फ़िर भी ख्वाब देखने की मेरी आदत बुरी सी है

हालाँकि मेरी साँसे छीनती हैं मुझसे
फ़िर भी तेरी यादें मेरी जिंदगी सी हैं